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Ranthambore Fort: रणथंभौर किले का असली इतिहास; जाट शासकों की वीरता की कहानी

By हरियाणा न्यूज टूडे

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Ranthambore Fort Jat History Nagil Jat

रणथंभौर का किला: जाट इतिहास, शौर्य और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक

Ranthambore Fort : जिसे आज विश्व प्रसिद्ध रणथंभौर किले और टाइगर रिज़र्व के लिए जाना जाता है, केवल एक पर्यटन स्थल नहीं बल्कि भारत के प्राचीन जाट इतिहास, संघर्ष और स्वाभिमान की अमिट गाथा भी है। बहुत कम लोग जानते हैं कि रणथंभौर की नींव नागिल जाट शासकों द्वारा रखी गई थी।

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रणथंभौर का नामकरण और स्थापना

इतिहासकारों के अनुसार रणथंभौर की स्थापना नागिल जाट सरदार रणमल द्वारा की गई थी। रणमल ने इस स्थान पर एक विशाल स्तंभ (स्तंभ) स्थापित कर अपने राज्य की घोषणा की, जिसके कारण इसका नाम पहले रणस्तंभ, फिर रणस्तंभपुरा और कालांतर में रणथंभौर पड़ा।

चौहान वंश के शासन से लगभग दो शताब्दी पहले तक रणथंभौर और इसके आसपास के क्षेत्रों पर गोरा और नागिल जाटों का प्रभावी शासन था। यह तथ्य राजस्थान के प्राचीन राजनीतिक इतिहास को एक नया दृष्टिकोण देता है।

 

महाराजा सजराज वीर सिंह नागिल: रणथंभौर के महान शासक

रणथंभौर के इतिहास में महाराजा सजराज वीर सिंह नागिल (880–935 ई.) का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। वे नागिल जाट राज्य के सबसे शक्तिशाली और दूरदर्शी शासक माने जाते हैं।

  • उन्होंने लगभग 20,000 सैनिकों की सेना तैयार की
  • 10,000 सैनिकों का विशेष सुरक्षा काफिला बनाया
  • किले और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे का विकास कराया
  • बाहरी आक्रमणकारियों से रणथंभौर की सफलतापूर्वक रक्षा की

इन्हें रणथंभौर किले ( Ranthambore Fort )  के प्रारंभिक संस्थापक और निर्माता के रूप में भी देखा जाता है, हालांकि किले के अंतिम स्वरूप को लेकर इतिहास में मतभेद हैं।

जैन धर्म से जुड़ा रहा रणथंभौर ( Ranthambore Fort Jat history )

12वीं शताब्दी में, चौहान शासक पृथ्वीराज प्रथम के समय रणथंभौर जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। प्रसिद्ध जैन आचार्य सिद्धसेनसूरि ने इस क्षेत्र को पवित्र जैन तीर्थों की सूची में शामिल किया था। मुगल काल में भी यहां मल्लिनाथ जैन मंदिर का निर्माण हुआ, जो आज भी धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है।

 

मुस्लिम आक्रमणों के विरुद्ध जाटों की निर्णायक भूमिका ( Jat History )

इतिहास गवाह है कि रणथंभौर के जाट सरदारों ने मुस्लिम आक्रमणकारियों के खिलाफ भागा भट्ट चौहान का समर्थन किया। दिल्ली सल्तनत की राजनीति में भी रणथंभौर की अहम भूमिका रही।

दिल्ली की शासिका रजिया सुल्तान और उनके सहयोगी जलाल-उद-दीन अल्तुनिया ने भी रणथंभौर के जाटों से सैन्य सहायता मांगी थी। जाटों के सहयोग से अल्तुनिया ने दिल्ली पर आक्रमण तक किया, जिससे जाटों की सैन्य और राजनीतिक ताकत स्पष्ट होती है।

 

रणथंभौर किला: सत्ता संघर्षों का साक्षी

नागिल जाटों के बाद यह किला विभिन्न शक्तियों के हाथों में गया—

  • चौहान वंश (दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध संघर्ष का केंद्र)
  • मेवाड़ राज्य (14वीं–15वीं शताब्दी)
  • बूंदी के हाड़ा राजपूत
  • मुगल साम्राज्य (16वीं शताब्दी)
  • जयपुर के कछवाहा शासक (17वीं शताब्दी)

भारतीय स्वतंत्रता के बाद 1950 में रणथंभौर राजस्थान राज्य का हिस्सा बना।

 

 

रणथंभौर: केवल किला नहीं, इतिहास की चेतना

रणथंभौर का किला आज भी जाट वीरता, आत्मसम्मान और संघर्ष की जीवित मिसाल है। यह स्थल हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल अतीत नहीं होता, बल्कि वह भविष्य की दिशा तय करने की शक्ति भी रखता है।

“एक बिखरी हुई कौम को जीवित करने के लिए इतिहास से बढ़कर कोई दिव्य शक्ति नहीं है।”

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