महिलाओं ने देशी वेशभूषा में झूले झूले, सावन के गीतों से माहौल बना
Narnaund News । सावन का महीना आते ही हरियाणा के गांवों और कस्बों में लोक संस्कृति की रंगत देखने को मिलती है। सावन के महीने में मनाया जाने वाला तीज का त्योहार महिलाओं के लिए खास महत्व रखता है। नारनौंद क्षेत्र में भी तीज का त्योहार पारंपरिक रीति-रिवाजों और हरियाणवी संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया। महिलाओं ने देशी वेशभूषा में सज-धजकर झूले झूले और सावन के पारंपरिक गीत गाकर त्योहार की खुशियां मनाईं।
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नारनौंद में महिलाओं ने मनाया तीज का त्योहार

सावन के महीने में तीज का त्योहार हरियाणवी संस्कृति और ग्रामीण जीवन की खूबसूरत परंपराओं से जुड़ा हुआ है। नारनौंद में महिलाओं ने इस पर्व को उत्साह और उल्लास के साथ मनाया। महिलाएं पारंपरिक हरियाणवी पोशाक पहनकर एक स्थान पर एकत्रित हुईं और झूला झूलने के साथ सावन के गीत गाकर त्योहार का आनंद लिया।
नारनौंद में तीज पर महिलाओं ने गाए सावन के गीत
Haryana News Today in Hindi: हरियाली तीज के अवसर पर महिलाओं में खास उत्साह देखने को मिला। कई महिलाएं कुर्ता-दामन पहनकर और पारंपरिक आभूषणों से सजकर पहुंचीं। सिर पर बोरला, गले में सोने की गंठी और कमर में तगड़ी जैसे पारंपरिक आभूषणों ने महिलाओं के श्रृंगार को और आकर्षक बना दिया।

महिलाओं का कहना था कि उन्हें हर साल तीज के त्योहार का बेसब्री से इंतजार रहता है। यह पर्व केवल झूला झूलने और पकवान खाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से हरियाणवी संस्कृति, लोकगीत और पारंपरिक रीति-रिवाजों को भी जीवंत रखने का अवसर मिलता है।
झूलों पर दिखी सावन की मस्ती
तीज के त्योहार पर झूला झूलने की परंपरा सदियों पुरानी है। नारनौंद में भी महिलाएं और युवतियां झूला झूलने के लिए एकत्रित हुईं। झूले पर बैठकर महिलाएं सावन के गीत गाती नजर आईं। किसी के चेहरे पर मुस्कान थी तो कोई अपनी सहेलियों के साथ हंसी-मजाक करते हुए त्योहार का आनंद ले रही थी।

झूले के आसपास सावन के गीतों की आवाज सुनाई देती रही। वातावरण में लोकगीतों की मिठास और महिलाओं की खिलखिलाहट ने पूरे माहौल को खुशनुमा बना दिया।
सावन के गीतों की झलक
तीज के अवसर पर महिलाओं ने पारंपरिक अंदाज में सावन के गीत गाए। गीतों में सावन की फुहार, मायके की याद, सखियों के साथ झूला झूलने और हरियाली के मौसम का जिक्र सुनाई दिया।
“सावन आया रे, झूला पड़ गया बाग में,
सखियां मिल बैठी सावन के राग में…”
लोकगीतों की यह परंपरा हरियाणा की ग्रामीण संस्कृति की पहचान रही है। बुजुर्ग महिलाओं से लेकर नई पीढ़ी तक इन गीतों को सीखती और आगे बढ़ाती रही है। तीज जैसे त्योहार इन लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनते हैं।
महिलाओं ने बताया कि आज के आधुनिक दौर में मनोरंजन के साधन काफी बढ़ गए हैं, लेकिन तीज के अवसर पर एक साथ बैठकर लोकगीत गाने और झूला झूलने की खुशी अलग ही होती है।
घरों में तैयार किए गए देसी पकवान

तीज के त्योहार पर घरों में विशेष पकवान बनाने की भी परंपरा है। नारनौंद क्षेत्र में महिलाओं ने घर पर ही विभिन्न प्रकार के पारंपरिक व्यंजन तैयार किए और उन्हें साथ लेकर तीज मनाने पहुंचीं।
महिलाओं के अनुसार तीज के मौके पर गुलगुले और सवाली जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। इसके अलावा घरों में अपनी पसंद के अन्य देसी व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। इन पकवानों को परिवार और सखियों के साथ बांटकर खाने की परंपरा त्योहार की खुशी को और बढ़ा देती है।
गांवों में आज भी तीज के दौरान घरों में पकवान बनाने की परंपरा कायम है। बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी की लड़कियों को इन व्यंजनों को बनाने की विधि बताती हैं। इससे खान-पान से जुड़ी पुरानी परंपराएं भी आगे बढ़ती रहती हैं।
हरियाणवी पहनावे ने खींचा ध्यान
तीज के कार्यक्रम में महिलाओं का पारंपरिक पहनावा आकर्षण का केंद्र रहा। महिलाओं ने कुर्ता-दामन पहनकर हरियाणवी संस्कृति की झलक पेश की। पारंपरिक आभूषणों के साथ सजी महिलाओं ने त्योहार के माहौल को और रंगीन बना दिया।
हरियाणवी वेशभूषा में महिलाओं ने मनाई तीज

महिलाओं ने बताया कि तीज के अवसर पर पारंपरिक पोशाक पहनने का अपना अलग महत्व है। कुर्ता-दामन, बोरला, तगड़ी और गंठी जैसे आभूषण हरियाणवी महिला के पारंपरिक श्रृंगार का हिस्सा रहे हैं।
आज के समय में जहां आधुनिक फैशन का चलन तेजी से बढ़ रहा है, वहीं तीज जैसे पर्व पर पारंपरिक पहनावे को अपनाना हरियाणवी संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास भी माना जा सकता है।
महिलाओं ने बताया तीज का महत्व
तीज मनाने पहुंची सुषमा पांचाल, पूनम, सरला, अंजू, संतोष नाड़ा और पिहू सहित अन्य महिलाओं ने बताया कि सावन का महीना आते ही तीज के त्योहार का इंतजार शुरू हो जाता है।
उन्होंने कहा कि तीज उनके लिए केवल एक त्योहार नहीं बल्कि सखियों और परिवार के साथ खुशियां बांटने का अवसर है। इस दिन महिलाएं घर के कामकाज से कुछ समय निकालकर एक साथ बैठती हैं, झूला झूलती हैं, गीत गाती हैं और पारंपरिक पकवानों का आनंद लेती हैं।
महिलाओं ने कहा कि ऐसे आयोजनों से बच्चों और युवाओं को भी अपनी संस्कृति और लोक परंपराओं के बारे में जानने का अवसर मिलता है।
लोक संस्कृति को बचाने में त्योहारों की अहम भूमिका
हरियाणा की पहचान उसकी मजबूत ग्रामीण संस्कृति, लोकगीतों और पारंपरिक त्योहारों से भी है। तीज, होली, दिवाली, लोहड़ी और अन्य पर्व सामाजिक मेलजोल को मजबूत करते हैं।

विशेष रूप से तीज के त्योहार में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक देखने को मिलती है। सावन की हरियाली के बीच झूले, लोकगीत और पारंपरिक पकवान इस पर्व को अलग पहचान देते हैं।
बुजुर्गों का मानना है कि आधुनिकता के दौर में लोक संस्कृति को बचाए रखने के लिए नई पीढ़ी को इन त्योहारों से जोड़ना जरूरी है। जब बच्चे अपनी दादी-नानी और परिवार की महिलाओं से सावन के गीत सुनते हैं तो उन्हें अपनी जड़ों और संस्कृति के बारे में जानकारी मिलती है।
तीज के दौरान गूंजते सावन के गीत और झूलों की मस्ती जहां ग्रामीण संस्कृति की खूबसूरती को सामने लाती है, वहीं जरूरत इस बात की है कि त्योहारों और लोक परंपराओं के माध्यम से ग्रामीण संस्कृति को आगे बढ़ाया जाए















