हरियाणा में मानसून की रफ्तार सुस्त
चंडीगढ़/हिसार। हरियाणा में कमजोर पड़ा मानसून ( Haryana monsoon 2026 ) और मानसून की रफ्तार सुस्त पड़ती हुई नजर आ रही है। जुलाई के तीसरे पखवाड़े में जहां किसानों को लगातार बारिश की उम्मीद थी, लेकिन हांसी, हिसार, भिवानी , चरखी दादरी, जींद, रोहतक, सिरसा और फतेहाबाद सहित कई जिलों में बादल तो आए, लेकिन खेतों को राहत देने लायक बारिश नहीं हुई। कमजोर मानसून की वजह से धान की फसल पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। किसान अब नहरों तथा ट्यूबवेलों के भरोसे खेती बचाने की कोशिश कर रहे हैं। हाल के दिनों में हरियाणा में वर्षा की कमी दर्ज की गई है और कई जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!हरियाणा मौसम की ताजा खबर
बारिश की असमान तस्वीर, कहीं फुहार तो कहीं सूखी धरती
मौसम विभाग के अनुसार पिछले 24 घंटों में हरियाणा के कुछ हिस्सों में हल्की बारिश दर्ज हुई, लेकिन अधिकांश कृषि क्षेत्रों में यह बारिश नाकाफी रही। हिसार और हांसी में लगभग 1 सेमी के आसपास वर्षा दर्ज की गई, जबकि कई स्थानों पर बारिश नाममात्र रही। ( Weather Update in Haryana )
धान की फसल सबसे ज्यादा प्रभावित
धान की रोपाई के बाद लगातार पानी की आवश्यकता होती है। लेकिन पिछले कई दिनों से पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण खेतों में नमी तेजी से कम हो रही है।
ट्यूबवेल चलाने की लागत बढ़ रही है। बिजली की खपत बढ़ने से किसानों का खर्च बढ़ गया है। जिन गांवों में नहरी पानी की सप्लाई सीमित है, वहां धान की फसल पर अधिक खतरा है। यदि अगले 5–7 दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
हांसी-हिसार बेल्ट क्यों सबसे ज्यादा चिंताजनक?
हिसार और हांसी का क्षेत्र अर्ध-शुष्क जलवायु वाला माना जाता है। यहां मानसून की बारिश खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। लगातार कम वर्षा होने से मिट्टी तेजी से सूख रही है और खेतों में दरारें दिखाई देने लगी हैं। ऐसे में किसान सिंचाई के वैकल्पिक साधनों पर निर्भर हो रहे हैं।
किसानों की बढ़ी चिंता
ग्रामीण इलाकों में किसान अब आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। उनका कहना है कि यदि जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो:
धान की बढ़वार रुक सकती है।
दोबारा सिंचाई पर अतिरिक्त खर्च आएगा।
छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ेगा।
विश्लेषण: यह सिर्फ बारिश की कमी नहीं, खेती की लागत का संकट भी है
इस बार चुनौती केवल कम बारिश नहीं है। डीजल, बिजली और सिंचाई का खर्च बढ़ने से खेती महंगी होती जा रही है। यदि मानसून जल्द सक्रिय नहीं हुआ तो धान के साथ-साथ चारे और अन्य खरीफ फसलों पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्षा की असमानता आने वाले वर्षों में खेती की रणनीति बदलने की जरूरत का संकेत भी है।

