हरियाणा की प्राचीन लोक संस्कृति है दशहरा सांझी परंपरा
Sanjhi Tradition Haryana: आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच भी हरियाणा की प्राचीन लोक परंपराओं को सहेजने का प्रयास जारी है। नारनौंद में दशहरे के अवसर पर महिलाएं सांझी बनाने में जुटी हुई हैं। मिट्टी से सांझी की मूर्ति और विभिन्न पारंपरिक आकृतियां तैयार कर महिलाएं न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी लोक संस्कृति से जोड़ने का संदेश दे रही हैं।
नारनौंद की पार्षद सुनीता लोहान, रोशनी देवी, कृष्णा, शांति देवी, संजय देवी उर्फ माड़वे की बहू, श्रेया सहित कई महिलाएं एकत्रित होकर सांझी की तैयारियों में जुटी हैं। महिलाएं मिलकर मिट्टी को आकार देकर सांझी की मूर्ति के साथ गांठी, गलसरी, माला, झालरे, भाई, सितारे और चांद-सितारे जैसी पारंपरिक आकृतियां बना रही हैं। तैयार आकृतियों को सूखने के लिए कपड़ों पर करीने से रखा गया है।
आठम को भाई आएगा लेने, दशहरा सांझी की दशमी को होगी विदाई
Sanjhi festival: सांझी की परंपरा में भाई-बहन के रिश्ते का विशेष महत्व है। महिलाओं के अनुसार, लोक मान्यता के मुताबिक आठम के दिन सांझी का भाई उसे लेने आएगा। नवमी के दिन वह अपनी बहन के घर ठहरेगा और दशहरे यानी दशमी को सांझी को अपने साथ लेकर जाएगा। इस परंपरा में भाई-बहन के स्नेह, पारिवारिक रिश्तों और लोक मान्यताओं की झलक देखने को मिलती है।
एकम से दशहरे तक गूंजेंगे सांझी के गीत और भजन
सांझी का उत्सव (Sanjhi festival) केवल मिट्टी की आकृतियां बनाने तक सीमित नहीं है। एकम से लेकर दशहरे तक महिलाएं सांझी से जुड़े पारंपरिक लोकगीत और भजन गाएंगी। इस दौरान महिलाएं सामूहिक रूप से एकत्रित होकर सांझी की पूजा-अर्चना करेंगी और वर्षों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करेंगी। गीत-संगीत और सामूहिक आयोजन के माध्यम से महिलाओं के बीच आपसी मेलजोल और सांस्कृतिक जुड़ाव भी मजबूत होता है।
मिट्टी की आकृतियों में झलकती लोक संस्कृति
सांझी की परंपरा लोककला, आस्था और पारिवारिक भावनाओं का अनूठा संगम है। मिट्टी से बनाई जाने वाली विभिन्न आकृतियां इस लोक उत्सव की विशिष्टता को दर्शाती हैं। नारनौंद की महिलाओं की सामूहिक भागीदारी यह संदेश देती है कि पारंपरिक रीति-रिवाजों को जीवित रखने में समाज की अहम भूमिका होती है।
दशहरे के अवसर पर सांझी तैयार कर महिलाएं अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। उनके इस प्रयास से क्षेत्र की लोक परंपराओं को नई पहचान मिल रही है। साथ ही, लोकगीतों, पारंपरिक कलाओं और रीति-रिवाजों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी मिल रहा है।










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