AMI AMSc Lecture 2026: Microbiology Connect Lecture Series
नई दिल्ली | 1 फरवरी 2026
AMI AMSc विशेषज्ञ व्याख्यान श्रृंखला 2026 का तीसरा व्याख्यान “How Microbes Can Shape Your Career: Opportunities in Sustainable Agriculture” शीर्षक से 1 फरवरी 2026 को गो-टू मीटिंग (GoTo Meeting) प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऑनलाइन आयोजित किया गया। यह व्याख्यान अकादमी ऑफ माइक्रोबायोलॉजिकल साइंसेज़ (AMSc) द्वारा प्रारंभ की गई “माइक्रोबायोलॉजी कनेक्ट” व्याख्यान श्रृंखला 2026 के अंतर्गत, एसोसिएशन ऑफ माइक्रोबायोलॉजिस्ट्स ऑफ इंडिया (AMI) के सहयोग से आयोजित हुआ।
पुसा डीकंपोज़र से करियर निर्माण तक: AMI–AMSc व्याख्यान में सूक्ष्मजीवों की ताकत उजागर
कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं एवं युवा पेशेवरों को सतत कृषि, सूक्ष्मजीवविज्ञान और उभरते करियर अवसरों से परिचित कराना था, जिससे वे बदलते कृषि-पर्यावरण परिदृश्य में अपनी भूमिका को समझ सकें।
उद्घाटन सत्र में विशेषज्ञों ने रखे विचार

कार्यक्रम का शुभारंभ प्रो. नमिता सिंह (महासचिव, AMI) द्वारा स्वागत भाषण एवं विशेषज्ञ वक्ता के परिचय के साथ हुआ। इसके पश्चात प्रो. आर. सी. कुहाड़ (अध्यक्ष, AMSc) ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए व्याख्यान श्रृंखला की अवधारणा, उद्देश्य एवं महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह मंच विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को देश के प्रतिष्ठित सूक्ष्मजीवविज्ञानियों से सीधे संवाद का अवसर प्रदान करता है।
प्रो. प्रिंस शर्मा (अध्यक्ष, AMI) ने सतत कृषि और करियर निर्माण के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यान विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। वहीं प्रो. आर. सी. कुहाड़ ने अपने संबोधन में वक्ता, वरिष्ठ वैज्ञानिकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी के लिए आभार व्यक्त किया।
डॉ. लिवलीन शुक्ला ने प्रस्तुत किया विशेषज्ञ व्याख्यान
इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. लिवलीन शुक्ला, प्रधान वैज्ञानिक, सूक्ष्मजीवविज्ञान प्रभाग, आईसीएआर–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली, ने व्याख्यान प्रस्तुत किया। डॉ. शुक्ला कृषि अपशिष्ट पुनर्चक्रण और सतत कृषि के क्षेत्र में अपने अग्रणी योगदान के लिए जानी जाती हैं तथा पुसा डीकंपोज़र (सूक्ष्मजीवी-फंगल कंसोर्टियम) के विकास में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
हरित क्रांति से सतत कृषि तक का सफर

डॉ. शुक्ला ने अपने व्याख्यान में भारतीय कृषि के विकासक्रम को रेखांकित करते हुए बताया कि हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन रासायनिक-आधारित कृषि प्रणाली ने मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव भी डाले। उन्होंने वर्तमान समय में पर्यावरण-अनुकूल, जलवायु-संवेदनशील और सूक्ष्मजीव-आधारित कृषि प्रणालियों की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने बताया कि सूक्ष्मजीव न केवल मृदा स्वास्थ्य सुधारते हैं, बल्कि पोषक तत्व चक्रण, जैव-उर्वरक, जैव-नियंत्रण, कम्पोस्टिंग और अपशिष्ट मूल्यवर्धन जैसे क्षेत्रों में भी केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
सतत कृषि के प्रमुख आयामों पर चर्चा
व्याख्यान के दौरान डॉ. शुक्ला ने एकीकृत कीट प्रबंधन, मृदा जैवविविधता, माइकोराइज़ा, पीजीपीआर, सिंथेटिक सूक्ष्मजीवी समुदाय, कंसोर्टियम-आधारित फॉर्मुलेशन, संपीड़ित जैव-गैस (CBG) संयंत्र, प्रिसीजन एग्रीकल्चर और स्मार्ट फार्मिंग जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य की कृषि केवल उत्पादन तक सीमित नहीं होगी, बल्कि स्थिरता, नवाचार और तकनीक-आधारित समाधान इसकी पहचान होंगे।
करियर अवसरों और कौशल विकास पर विशेष जोर
डॉ. शुक्ला ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि कृषि सूक्ष्मजीवविज्ञान में करियर की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कृषि, मृदा, पर्यावरणीय, औद्योगिक एवं डेयरी सूक्ष्मजीवविज्ञान, एग्री-इनपुट उद्योग, गुणवत्ता नियंत्रण एवं विनियामक सेवाएं, अनुसंधान एवं शिक्षण, स्टार्टअप एवं उद्यमिता, साथ ही बैंकिंग, प्रशासन, बीमा एवं विस्तार सेवाओं जैसे विविध क्षेत्रों को रेखांकित किया।
उन्होंने प्रयोगशाला-आधारित प्रशिक्षण, उद्योग-उन्मुख कौशल विकास और बहु-विषयक दृष्टिकोण को करियर सफलता की कुंजी बताया।
प्रश्नोत्तर सत्र में हुआ गहन संवाद
व्याख्यान के उपरांत आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने जैव-उपचार द्वारा कीटनाशक अवशेष प्रबंधन, जैव-उर्वरकों से बंजर भूमि का पुनर्स्थापन, सूक्ष्मजीवों के माध्यम से सतत पोषक तत्व उपलब्धता तथा मृदा में लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया की सीमित उपयोगिता जैसे विषयों पर प्रश्न पूछे। डॉ. शुक्ला ने सभी प्रश्नों के व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्तर दिए।
युवा शोधकर्ताओं को प्रेरक संदेश
अपने समापन संबोधन में डॉ. लिवलीन शुक्ला ने विद्यार्थियों और युवा शोधकर्ताओं को कौशल-आधारित अधिगम, नवाचार और उद्यमशील सोच अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि सूक्ष्मजीवविज्ञानी अनुसंधान, उद्योग, नीति निर्माण और जमीनी क्रियान्वयन के बीच सेतु बनाकर सतत कृषि के भविष्य को दिशा दे सकते हैं।
यह सत्र विशेष रूप से स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, शोधार्थियों, युवा शिक्षकों और प्रारंभिक करियर पेशेवरों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक सिद्ध हुआ तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के डिजिटल शिक्षण, करियर जागरूकता और प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों से संवाद जैसे उद्देश्यों के अनुरूप रहा।