Leaders, fasten your seat belts, the election
plane is ready to take off
हरियाणा न्यूज टूडे/खबरची : सुरेंद्र सोढी
चुनावी मौसम है। हार जीत के बादल सबके सिरों पर मंडरा रहे हैं। मतदाता ऐसे कि शक्ल ओ सूरत कैसी भी हो परंतु वोट रूपी मणि पाने के लिए सारे उम्मीदवार कायल हुए जा रहे हैं। इससे भी इतर यह कि मतदाताओं की इस पौ बारह से चुनावी मौसम खुशगवार होने को बेताब है। एक दूसरे पर तोहमतें जड़ रहे उम्मीदवारों की खुद व अपनी पार्टी को बेहतरीन बताने की हौड़ लगी है। संसद भवन की ओर उड़ान भरने वाले इस जहाज में सवार होने की बेसब्री में इन महाशयों की बोलचाल भी जमीनी स्तर की हुए जा रही है। पार्टी से टिकट पाने के बाद अब मतदाताओं से वीजा पाने को बेताब नेतागण दर दर भटकने को मजबूर हैं। ( Lok sabha election 2024 special story )
मेरे पिया गए ससुराल
आदमपुर में भाजपा की रैली हुई तो लोगों के बीच मंच पर आदमपुर नरेश और उनके राजकुंवर बेटे नजर आने के साथ तुर्रा यह कि भाषण देकर पार्टी उम्मीदवार को जिताने की अपरोच भी लगा दी। भाजपाईयों ने सुकून लिया कि दिल्ली में की गई मनाने की मशक्कत रंग ला चुकी है। अब एक दिन पहले भाजपा उम्मीदवार ने हिसार से नामांकन दाखिल किया तो आदमपुर व उनके राजकुंवर बेटे दोनों ही गायब थे। बताया गया कि आदमपुर वाले राजकुंवर ससुराल गए हैं और राजाधिराज दिल्ली। ऊपर से भाजपा के दिग्गज नेता एवं पूर्वमंत्री का गुस्सा। तौबा तौबा, इतना कि सब हैरान। फिर भी सफारी सूट में बन ठन कर घूम रहे कार्यकर्ता ने जोर देकर कहा कि भाजपा के प्रेम सौहार्द और एकजुटता का मुकाबला कोई दूसरा दल क्या करेगा। ( Haryana Lok sabha election latest news )
सवालों भाग रहे महाशय
दो भागों में बंटी मीडिया में एक सत्तासीन का राग अलापने और दूसरी कोसने में जुटी है। इस बीच संसद पहुंचने की इस जंग में महाभारत के संजय की तरह सोशल मीडिया ऐसे अवतरित हुई कि अखबार और इलेक्ट्रिोनिक मीडिया तक खबर पहुंचने से पहले ही लोगों के मोबाइल पर वीडियों के रूप में नेताओं की पोल हाजिर है। हालत ऐसे हो गए कि सवाल करने से पीछे हटने वाले मीडिया का काम आमजन से खुद ही संभाल लिया है। खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में आम आदमी वोट मांगने आने वाले नेताओं से सवाल पूछने लगे हैं। अब नेता है कि सोशल मीडिया के घातक परिणाम से बचने के लिए पहले सौ जतन कर रहे हैं। ( latest news Lok sabha election 2024 )
ना दो टिकट निर्दलीय लड़ूंगा
टिकट मिलने से पहले अपनी पार्टी को सबसे बेहतरीन बताने वाले नेताओं ने एकाएक उस वक्त पलटी मार ली जब टिकट किसी और को मिल गई। उससे ज्यादा भीतर का ज्वालामुखी जब फटा जब एक दिन पहले पार्टी में आए लोगों को चुनाव के रथ पर सवार कर दिया। ऊपर से बेटिकटों को यह भी आदेश दिए गए कि अब यह रथ अपने कंधों पर उठाकर पूरे इलाके में घुमाओ और इसमें सवार के लिए नारे भी लगाओ। इस हालात में बेटिकटों ने अपनी तमतमाए चेहरें को ढांप कर नीचे ही नीचे रथ में सवार इन महारथियों को संसद वाले जहाज में सवार न होने के लिए जतन शुरू कर दिए हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे भी हैं जो बेवजह टिकट के दावेदार बनकर अब निर्दलीय चुनाव लडऩे को तैयार हैं। ये अलग बात है कि ऐसे महाशय अब चुनाव में उतरकर विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार करने की नाकाम कोशिश में हैं। ( latest news Haryana Loksabha election )
वो हारैगा, मैं जीतूंगा। देख लिए
अजब गजब कांफिडेंस देखने को मिल रहा है। नेता तो नेता उनके समर्थक तो लाठी डंडे की जुबान में म्हारै आला जीतैगा का दावा कर रहे हैं। किसी चुनाव कार्यालय में देखो तो वहां बैठे लोग हवा की पूछते ही रजिस्टर निकाल कर आंकड़ें दिखाने लगते हैं। जातीय समीकरण में जिन जातियों के वोट अपनी ओर होने का दावा करते हैं, उन लोगों को ये पता ही नहीं कि चुनाव के दौरान उन्हें जातियों में बांटा जा रहा है। जमीन की सच्चाई यह कि इस बार मतदान में जातीय समीकरण हाशिये पर हो सकते हैं। दूसरे चुनावी कार्यालयों के ये विद्धान दूसरे दल की बात करते ही सौ अवगुणों के साथ हार का खाका दराज से निकाल लेते हैं। इास सभी के साथ सामने वाले से कहते हैं बताओ किसकी हवा है। वो गलती से किसी दूसरे का नाम ले दो तो चारों और से उसे बेवकूफ होने के अहसास की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। बस सुनते रहिए, सब यही कह रहे हैं म्हारै आला जीतैगा, उस आला हारैगा। ( breaking news Lok sabha election )
जितना बड़ा काफिला, उतनी बड़ी मौज
क्या आपने कभी गौर किया है कि चुनावी मौसम में अपनी शक्ति दिखाने के लिए भीड़ का इस्तेमाल करने वाले लोग ऐसा क्यो करते हैं। जितनी ज्यादा भीड़ उतनी ज्यादा लोकप्रियता और उतने ज्यादा वोट। बस इसी फार्मूले को सच मानकर शक्तिप्रदर्शन के लिए चाहे झूठ का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। बस जुगत शुरू हो जाती है भीड़ जुटाने की। इस भीड़ में अनेक लोगों की सच्चाई उस वक्त सामने आती है जब जिसपर संदेह हो उस व्यक्ति से आप पूछते हैं कि उम्मीदवार का नाम क्या है। सामने वाला बोलता है, पता नहीं हमें तो वो लेकर आया है। या फिर कोई ये कहता है कि हमें तो कोये ले आओ, भाईचारा निभाना है। दूसरी गौर करने वाली बात यह कि भीड़ को साथ लेकर चलने वाले नेतागण भीड़ से अलग दायें बायें खड़े के सामने मुस्करा कर हाथ जोड़ते हुए अभिवादन करते चलते हैं। सीधी बात यह कि देख लो इतनी भीड़ है, आप हमें ही वोट देना। ( Lok sabha election breaking news )
एक महीने से ज्यादा समय तक अकेले ही रिंग में खड़े भाजपा के पहलवानों को अब जाकर सांस आया जब कांग्रेस ने भी अपने उम्मीदवारों को रिंग में उतार दिया। राहत के साथ नई आफत भी आ गई कि अब सामने वाले की गतिविधियों पर भी नजर रखने की नई मुसीबत शुरू हो गई है। कहां कौन कमजोर, किसकी कहां पर पकड़, किसे कहां पर ध्वस्त कैसे करना है। ये सब रिंग में खड़े चुनावी पहलवानों को नई चुनौतियां मिल गई हैं। अभी तक अकेले रिंग में होने से मजा न आने और अब दुविधा शुरू होने के बीच संसद की ओर उड़ान भरने वाले जहाज पर नजर दौड़ाते हुए इधर उधर भटक रहे नेता अपनी गाड़ी में सीट बेल्ट बांध कर उड़ान के सपनों के साथ प्रैक्टिस कर रहे हैं।
आज बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर मिलते है खबरनामा के सफर में नए शोर के साथ।
आपका,
खबरची
सुरेंद्र सोढी, हिसार

