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प्रेम पींग की रस्सी टूटने के बाद राजकुमार को आया छौह : अब तो ओर भी भूंडी बणगी

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After breaking the love rope, the prince got worried: Now even more Bhundi has become

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 संजय! एक सरकार बनाने और दूसरी गिरने का ये क्या माजरा है

प्रतिकात्मक फोटो।

हरियाणा न्यूज टूडे : हरियाणा की ताजा राजनीतिक हालात पर विशेष: 

वो ऊपर बैठा हरियाणा के चुनावी महाभारत में मचे घमासान में एक नए हडक़ंप पर संजय की दूरदर्शिता से हालचाल जानने को बेताब दिखाई दिया। संजय ने भी सहज भाव से कह दिया कि महामना, बड़ी सरकार बनाते बनाते छोटी सरकार का सिंहासन डांवाडोल होने की सरसराहट है। राजनीति में एक पार्टी छोड़ दूसरे का पटका पहनने वाले बंदर की तरह कब टोपी फैंक कर पेड़ पर जा चढ़े, कौन जानें।

…तो संजय क्या छह महीने तक अविश्वास प्रस्ताव आ सकता है क्या?  महामना ने बड़े ही उत्सुक अंदाज में पूछा। संजय बोला, महामना, ये वो सरकार नहीं है जिसका पहले अविश्वास मत आया था। ये तो एकदम नई नवेली सरकार है। पिछले महीने ही तो नए राजकुंवर ने सिंहासन की बाजुओं पर हाथ फेरना शुरू किया है। पुराने वाले को तो उनके भक्त सूपर सूपर कहकर खुश करने में जुटे हैं। महामना, बड़ी सीट की जंग के बीच छोटी सरकार की मुक्त कंठ से प्रशंसा करने वाले कुछ निर्दलीय अब भविष्य की चिंता दूर करने के लिए दूसरे पाले में लंगोट बांधकर खड़े हो गए हैं। गले से समर्थन का पटका उतार कर विपक्ष के सेनापति की फौज के साथ खड़े हो गए हैं। बड़ी लड़ाई लड़ रहे हरियाणा की सरकार के सिपाही बस मुस्करा रहे हैं और बड़बोले कहे जाने वाले पुराने राजा अभी भी अनाप शनाप देकर अपने ही खेमे के लोगों को विचलित करने में जुटे हैं।

पूरी तरह छौह में आ एक पुराने राजकुमार

विपक्ष के साथ चले सत्ता वाले राजकुमार साढ़े चार साल तक सत्ता सुख भोगने के बाद प्रेम की पींग की रस्सी टूटने के बाद अब छौह में हैं। समझ गए ना महमना, बहुत ज्यादा क्रोधित होने को हरियाणवीं में छौह में आना कहा जाता है। सौ छौह में आए राजकुमार ने सत्ता सुख भोगने वाले नए राजकुमार के खिलाफ अपनी सेना विपक्ष के साथ जोडऩे का ऐलान कर दिया है। यहां सरकार गिरने में कमी रही तो साढ़े चार साल सत्ता में रहने वाले राजकुमार उस कमी की भरपाई करने को तैयार हैं। महामना, इन पुराने वाले राजकुमार को सत्तावाले सेनापति से गुस्सा इस बात पर की बिना बताए सियासत की चौपड़ पर अपनी ही चाल चलकर रियासत बचाने चले थे। तर्क यह भी कि खूंटा पाट्या पर गाय भी गेल भाजगी। अब गाय की भी सुण लो। नाम तो गाय रख दिया पर बोल सांड आले बोल के सारा ए सत्यानाश कर लिया। साढ़े चार साल सिंहासन के नशे में झूमे सेनापति ने अपने ही चहेते को स्प्रिंग लिकड़ा होया सिंहासन दे दिया। इब ना बैठे बणता ना ही उससे खड्या होणा।

इस और पुराने राजकुमार के साथ तो और भी भूंडी बणगी

महामना, किसी जमाने में सबसे ज्यादा सत्ता सुख पाने वाले सियासी खानदान के चश्मोचिराग और भी पुराने राजकुंवर के साथ भूंडी बणगी। एक महीने तक नए पुराने सेनापति के मानमन्नवर का बे्रकफास्ट, लंच और डीनर कर रहे इन राजकुंवर के बेटे को सेनापति ने नौजवानों का कमांडर बना दिया। इस ओहदे का मजा नहीं आया तो नाराजगी जारी रखी। रियासत की सियासत में मंत्री बनाए जाने का तोहफा दिखाया तो मान गए और बड़ी लड़ाई यानि बड़ी टिकट से महरूम रहे ये राजकुंवर बड़े चुनाव की जंग में अपनी सेना उतारने को तैयार हो गए। अपने सिपाहियों की मीटिंग बुलाई और जंग ए मैदान में उतरने का ऐलान करते हुए सत्ता में बेहतरीन दिनों का हवाला देते हुए पूरे भाव से सत्ता के सेनापति के लिए महाराजधिराज की मदद का ऐलान कर दिया। बस अच्छे दिन आने ही वाले थे कि सरकार के मुक्त कंठ से राग आलापने वालों को भला ये कहां बर्दाश्त होता कि उन्हें तो सरकार में जी हजूरी करते साढ़े चार साल बीत गए परंतु कुछ नहीं मिला। लोग हैं कि शामिल हो होकर टिकट तक पा गए। अब पुराने राजकुंवर का नया प्रिंस भी मंत्री बनेगा? बस इसी जलन की पूंछ से सत्ता वाली लंका जलाने का मन बना लिया और विपक्ष वाले सेनापति की सेना का समर्थन दे डाला।  

सत्ता वाले घायल मंत्री को घावों की मलहम की उम्मीद

साढ़े चार साल वाली सरकार जा रही थी तो राजपाट के एक नामचीन राजकुंवर को सेनापति होने का पूरा यकीन था। एक रात पहले सभी आंखों ही आंखों में उन्हें सेनापति होने का इशारा भी कर रहे थे। इसी यकीन के साथ अगले दिन जब सियासी दरबार में पहुंचे तो राजस्थान वाली पुडिय़ा यानि पर्ची उन्हें भी थमा दी गई। बस फिर क्या था, सब्र के घूंट गोलगप्पों में पानी के साथ गटकने पड़े। अब एक फिर सरकार जाने की खबर सुनी तो ये राजकुंवर एक बार फिर सिंहासन को देखकर मूंड मरोड़ रहे हैं। यकीन और भरोसा फिर से रजाई छोड़ बिस्तर से बाहर आ गए हैं। उनके चहेते भी बधाईयां दे रहे हैं। अगले कुछ महीनों की उम्र लिए सिंहासन पर एक बार बैठने की आस से पूरी उम्मीद से हो गए हैं। साढ़े नौ साल सिंहासन का रंग रोगन चट करने वाले पुराने सेनापति सत्ता ना जाने का दावा करते हुए सामने खड़ी सेना को ही अपना बताने लगे हैं। खैर खबरची तो सभी का शुभ शुभ ही चाहते हैं। खुदा करे, ना ना भगवान करे, चलो फाइनल राम करे, जी हां राम करे, नए पुराने सभी सेनापति और राजकुंवरों की आस पूरी हो।

और अब अंत में …
महाराजा नहीं तो कौन क्या, कंबलवाला

एक बार एक व्यक्ति कंधे में ढेर से कंबल उठाए जा रहा था। ज्यों ही उससे खबरची की नजरें मिली तो सीधा पास आ गया। बोला, कंबल ले लो सौ दे अठ… औ सौ दा एक। खबरची बोला, ये क्या है, सौ दे अठ यानि सौ रूपये के आठ कंबल। नहीं साहब, सौ रुपये का एक है, वो तो बस वैसे ही मेरे से निकल गया। खबरची बोला, हूं… जुबान से मुकर रहे हो। कंबल वाला बोला, चलो निकालो सौ रुपये, और कंधे से सारे कंबल पैरों में दे मारे। सौ का नोट लेकर कंबल बेचने वाला तो गायब हो गया परंतु कंबल देखे तो आठ परत वाला एक ही कंबल निकला।
खबरची के मुंह से बस इतना ही निकला कि कंबल बेचने वाला सियासत में चला जाए तो राजकुंवर और राजकुमारों को छोड़ो, ये तो महाराजाधिराज बनने वाले सर्वगुण संपन्न हस्ती है। अब कोई कहेगा कि महाराजा नहीं तो कौन, खबरची के पास एक नाम है, महाराजा नहीं तो कंबलवाला।
आज बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर मिलेंगे खबरची की नायाब खबरों के साथ।

खबरची : सुरेंद्र सोढी, शनास

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