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नारनौंद के बेटे की शाहदत: अंतिम संस्कार में ना ही नेता और ना ही अधिकारी पहुंचे, Hansi News Live

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Hansi News Live: Narnaund Kapro village son deepak goyat Shaheed

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Hansi News Live : भारतीय सेना में देश सेवा के जज्बे को लेकर भर्ती हुए हांसी जिले के गांव कापड़ो निवासी सैनिक 29 वर्षीय दीपक गोयत की अस्पताल में उपचार के दौरान अंतिम सांस ली। लेकिन उनके अंतिम संस्कार में देश के जवानों और किसानों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले किसी भी नेता ने पहुंचना उचित नहीं समझा। जिससे वह देश के दुश्मनों से नहीं बल्कि अपनी बीमारी और देश के खोखले सिस्टम से हार गया। जिससे गांव के लोगों में स्थानीय विधायक सहित अन्य नेताओं के खिलाफ भारी नाराजगी देखने को मिली।

शहीद सैनिक दीपक गोयत के अंतिम संस्कार में उमड़ा जनसैलाब 

भारतीय सेना में हवलदार के पद पर कार्यरत दीपक गोयत वर्ल्ड कैंसर की बीमारी से ग्रस्त था। दीपक गोयत का उपचार दिल्ली के आर्मी हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में चल रहा था। उपचार के दौरान सोमवार को उनका निधन हो गया। मंगलवार को जब उनका शव गांव में पहुंचा तो पूरा गांव उमड़ पड़ा। सेना के वाहन से जब उनके शव को उनके घर तक और घर से शमशान घाट तक ले जाया गया तो पूरा माहौल भारत माता की जय और दीपक गोयत अमर रहे के नारो से गूंज उठा। सैन्य सम्मान के साथ शहीद सैनिक दीपक गोयत का अंतिम संस्कार किया गया।

 

लोगों में उस समय भारी नाराजगी देखने को मिली जब शहीद सैनिक दीपक गोयत के अंतिम संस्कार में ना ही तो कोई प्रशासनिक अधिकारी वहां पर पहुंचा और ना ही नारनौंद विधायक जस्सी पेटवाड़ सहित कोई भी नेता शहीद को श्रद्धांजलि देने के लिए आया। ग्रामीणों ने कहा कि एक तरफ तो नेता वोट मांगने के लिए किसान और जवान की बात करते हैं जबकि देश पर अपने प्राणों का न्योछावर करने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए भी उनके पास समय नहीं है।

 

ग्रामीणों ने कहा कि वोट मांगने के लिए तो नेता दर-दर भटकते हैं लेकिन जब आम जनता पर दुख तकलीफ की बात आती है तो यह नेता उनकी तरफ देखना भी नहीं चाहते।इन्हें केवल अपने प्रचार के लिए गरीब जनता किसान और मजदूर का सहारा चाहते हैं। ताकि यह उनके मजबूर कंधों का सहारा लेकर अपने राजनीतिक कैरियर को चमका सके।

पशुओं की मौत पर हमदर्दी और शहादत पर दूरी, ये कैसी नेतागिरी 

नारनौंद उपमंडल के अलग-अलग गांव में पिछले दिनों हुई पशुओं की मौत पर हमदर्दी जताने तो स्थानीय विधायक जस्सी पेटवाड़ सहित अनेक नेता उनके द्वार पर पहुंचे। हालांकि आर्थिक सहायता कम ज्यादा करने पर आरोप प्रत्यारोप भी लगाए गए और सबने सोशल मीडिया पर पोस्टभ वायरल की। लेकिन जब शहीद सैनिक दीपक गोयत के अंतिम संस्कार में शामिल होकर उन्हें श्रद्धांजलि देने का समय आया तो सबको सांप सुंघ गया। 

 

ग्रामीणों ने बताया कि गांव से चंद किलोमीटर की दूरी पर पुलिस चौकी और उपतहसील है। लेकिन शहीद दीपक गोयत के अंतिम संस्कार में नहीं तो कोई तहसीलदार आया और ना ही पुलिस चौकी से कोई पुलिस कर्मी। यह बड़े शर्म की बात है कि देश पर अपने प्राणों का बलिदान देने वाले सैनिकों के लिए ना ही तो स्थानीय प्रशासन और ना ही राजनेताओं के दिलों में उनके प्रति कोई सहानुभूति है।

 

नारनौंद उपमंडल के गांव कापड़ों का यह लाल खेलों में बहुत ही होनार था और खेलकोटे से ही यह भारतीय सेना में सन 2016 में भर्ती हुआ था। सेना में भर्ती होने के बाद दीपक की शादी कर दी गई और शादी के बाद उसे की पत्नी ने दो जुड़वा बच्चियों को जन्म दिया था। दीपक गोयत के अंदर देश सेवा का इतना जज्बा था कि वह बिमारी से ग्रस्त होने के बाद भी हर समय देश की रक्षा और देश प्रेम की ही बातें करता था। उसकी ड्यूटी जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा और गूगलपुर में रही। जहां पर उसने अपने देश की रक्षा दुश्मनों से की। लेकिन उसके गांव के लोग उनके आसपास बैठे किसान और जवान के दुश्मनों को नहीं पहचान पाए।

 

शहीद सैनिक दीपक गोयत अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। लेकिन पिता भी सेना में थे जिसकी वजह से दीपक के अंदर भी देश सेवा का जज्बा कूट-कूट कर भरा हुआ था। इसी जज्बे के तहत दीपक सेना में भर्ती हो गया और पिता सेना से रिटायर हो गए। दीपक अपने पीछे अपने बुजुर्ग माता-पिता पत्नी और दो जुड़वा छोटी-छोटी मासूम बेटियों को छोड़कर चला गया है।

 

इसमें किसकी गलती है ये तो सामने नहीं आया। क्या सैनिक बोर्ड ने स्थानीय प्रशासन को सैनिक की शहादत से अवगत करवाया था, क्या सूचना मिलने के बाद भी प्रशासन और नेताओं ने जाना उचित नहीं समझा। आखिर क्या कारण रहे हैं इसकी जांच होनी चाहिए और लापरवाही बरतने वाले के खिलाफ ठोस कार्रवाई करनी चाहिए। 

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