Don’t ignore tremors and stiffness: It could be Parkinson’s disease
समय पर पहचान, नियमित देखभाल और फिजियोथेरेपी से मरीज जी सकते हैं सक्रिय और सम्मानजनक जीवन
बढ़ती उम्र के साथ कई स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती हैं, जिनमें पार्किंसन रोग एक गंभीर लेकिन अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला न्यूरोलॉजिकल विकार है। यह बीमारी मस्तिष्क में डोपामिन नामक रसायन की कमी के कारण होती है, जिससे शरीर की गति और संतुलन प्रभावित होते हैं।
इस रोग के शुरुआती लक्षणों में हाथों में कंपकंपी, चलने-फिरने में धीमापन, शरीर में जकड़न और संतुलन बनाए रखने में कठिनाई शामिल हैं। इसके अलावा, चेहरे के भाव कम होना, आवाज धीमी होना और लिखावट का छोटा हो जाना भी महत्वपूर्ण संकेत हो सकते हैं। दुर्भाग्यवश, लोग अक्सर इन लक्षणों को सामान्य बुढ़ापे का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे समय पर इलाज नहीं हो पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि पार्किंसन रोग का पूर्ण इलाज संभव नहीं है, लेकिन समय पर पहचान और उचित उपचार से इसके लक्षणों को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। दवाइयों के साथ-साथ फिजियोथेरेपी, नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली अपनाना अत्यंत आवश्यक है। रोजाना टहलना, स्ट्रेचिंग और संतुलन के अभ्यास मरीज की कार्यक्षमता और आत्मनिर्भरता बनाए रखने में सहायक होते हैं।
इसके साथ ही, परिवार का सहयोग और सकारात्मक वातावरण रोगी के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है। समाज में जागरूकता बढ़ाना और समय रहते चिकित्सकीय सलाह लेना इस रोग के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि आपके आसपास किसी व्यक्ति में ऐसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज न करें। समय पर उठाया गया कदम मरीज को बेहतर और गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अवसर प्रदान कर सकता है।
शर्म छोड़िए, समाधान चुनिएः महिलाओं में बढ़ती ‘यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस’ की समस्या और फिजियोथेरेपी का प्रभावी समाधान
लेखक विवरणः डॉ. सनी यादव (PT), असिस्टेंट प्रोफेसर, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी
विशेष स्वास्थ्य रिपोर्ट
बदलते दौर में महिलाओं की बढ़ती औसत आयु के साथ कुछ ऐसी स्वास्थ्य समस्याएं भी उभर रही हैं, जिन्हें अक्सर ‘शर्म के कारण दबा दिया जाता है। इन्हीं में से एक गंभीर समस्या है ‘यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस’ (UI) यानी अनैच्छिक रूप से पेशाब का निकल जाना। हालिया शोध बताते हैं कि यह समस्या न केवल बुजुर्ग महिलाओं में, बल्कि कॉलेज जाने वाली युवतियों में भी तेजी से बढ़ रही है। राहत की बात यह है कि फिजियोथेरेपी के आधुनिक तरीकों से इसका इलाज संभव है।
शोध के चौंकाने वाले आंकड़े
भारतीय महिलाओं पर आधारित एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार, यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस की व्यापकता लगभग 25.8% देखी गई है। उम्र बढ़ने के साथ यह खतरा बढ़ता है (76-85 वर्ष की 46.7% महिलाएं प्रभावित हैं)। वहीं, 18 से 25 वर्ष की अविवाहित युवतियों पर किए गए एक अन्य शोध में पाया गया कि 33.9% युवतियां इस समस्या से ग्रसित हैं। इनमें 26.5% में स्ट्रेस यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस ‘ (हंसने या खांसने पर रिसाव) सबसे आम है। इस समस्या के कारण लगभग 38.4% महिलाओं के सामाजिक आत्मविश्वास और जीवन की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है।
आधुनिक फिजियोथेरेपीः अब मशीनों और कसरत से जड़ से खत्म होगी समस्या
विशेषज्ञों के अनुसार, पेल्विक फ्लोर (श्रोणि क्षेत्र) की मांसपेशियों की कमजोरी ही इस समस्या की मुख्य जड़ है। फिजियोथेरेपी में उपलब्ध उपचार इस प्रकार हैं:
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पेल्विक फ्लोर रिहैबिलिटेशन (PFMT):
कीगल एक्सरसाइजः यह मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करने का सबसे प्रभावी तरीका है। सही तकनीक से किए गए अभ्यास मांसपेशियों की टोन वापस लाते हैं।
कोर स्टेबिलाइज़ेशनः पेट और पीठ की मांसपेशियों को सुदृढ़ करना ताकि मूत्राशय पर दबाव कम हो।
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अत्याधुनिक तकनीकेंः
बायोफीडबैक और इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशनः इन तकनीकों के जरिए कमजोर मांसपेशियों को सक्रिय किया जाता है, जिससे रिकवरी तेज होती है।
HIFEM (हाई-इंटेंसिटी फोकस्ड इलेक्ट्रोमैग्नेटिक): यह एक दर्द रहित, नॉन- इनवेसिव तकनीक है जो पेल्विक फ्लोर को गहराई से मजबूत करती है।
- व्यवहार परिवर्तन और ब्लैडर ट्रेनिंगः फिजियोथेरेपिस्ट की देखरेख में पेशाब के समय को नियंत्रित करना और बैठने के सही तरीके (Posture) में सुधार करना मूत्राशय की क्षमता बढ़ाता है।
विशेषज्ञ की राय
चिकित्सकों का मानना है कि इसे उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर ‘कालीन के नीचे छुपाना गलत है। शुरुआती लक्षणों को पहचानकर यदि सही समय पर फिजियोथेरेपी शुरू की जाए, तो महिलाएं फिर से आत्मसम्मान के साथ एक सक्रिय सामाजिक जीवन जी सकती हैं। अब आधुनिक विज्ञान ने इलाज को बेहद आसान और सुलभ बना दिया है।
लेखक विवरणः डॉ. शिखा मलिक (PT), असिस्टेंट प्रोफेसर, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी