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सरकारी रैलियों से हाय-तौबा: रोडवेज बसें रैली में भेजीं, यात्री हुए बेहाल | Haryana News

By हरियाणा न्यूज टूडे

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Haryana News Today: मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए जबरन/आदेशात्मक ढंग से रोडवेज बसों की तैनाती इन दिनों आम यात्रियों के लिए बड़ी समस्या बनती जा रही है। रोजमर्रा के काम, इलाज, पढ़ाई और रोजगार के लिए सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हजारों यात्रियों को बसों की कमी, रूट कैंसिलेशन और घंटों की देरी का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति सिर्फ असुविधा तक सीमित नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर भी सवाल खड़े करती है।

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रैलियों की तैयारी और रोडवेज की ‘कुर्बानी’ ( Haryana Politics News )

राज्य में जब भी मुख्यमंत्री या सत्तारूढ़ दल की बड़ी रैली तय होती है, उससे एक-दो दिन पहले ही रोडवेज डिपो से दर्जनों बसें ‘विशेष ड्यूटी’ के नाम पर निकाल ली जाती हैं। इन बसों को विभिन्न जिलों और कस्बों से लोगों को रैली स्थल तक पहुंचाने के लिए लगाया जाता है। नतीजा यह होता है कि नियमित रूटों पर बसों की संख्या अचानक घट जाती है। कई रूटों पर तो पूरी तरह बस सेवा ठप हो जाती है, वहीं कुछ रूटों पर यात्रियों को दोगुना-तिगुना इंतजार करना पड़ता है।

 

आम यात्री सबसे ज्यादा प्रभावित ( Today Haryana Latest News )

रोडवेज बसें राज्य के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों की जीवनरेखा हैं। निजी बसों की पहुंच हर गांव तक नहीं है और जहां है, वहां किराया अधिक है। ऐसे में मजदूर, किसान, छात्र, बुजुर्ग और महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। अस्पताल जाने वाले मरीजों को समय पर साधन नहीं मिल पाता, परीक्षार्थी परीक्षा केंद्र तक देर से पहुंचते हैं और नौकरीपेशा लोगों की हाजिरी पर असर पड़ता है। कई यात्रियों का कहना है कि रैली के दिनों में बस स्टैंड पर ‘नो बस’ जैसा माहौल बन जाता है।

 

बस स्टैंडों पर अफरा-तफरी ( Haryana Roadways News )

रैली वाले दिनों में जिला मुख्यालयों और उप-मंडल स्तर के बस स्टैंडों पर अफरा-तफरी आम बात हो गई है। यात्रियों की लंबी कतारें, पूछताछ काउंटर पर भीड़ और कर्मचारियों से बहस—यह सब रोज का दृश्य बन चुका है। कई बार यात्रियों को यह भी नहीं बताया जाता कि कौन-सी बस रद्द है और कब तक अगली बस मिलेगी। सूचना के अभाव में लोग निजी साधनों या महंगे टैक्सियों का सहारा लेने को मजबूर होते हैं।

 

स्वैच्छिक’ भीड़ या प्रशासनिक दबाव?

सरकार की ओर से अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि रैलियों में लोग स्वेच्छा से आते हैं और बसों का उपयोग जनसुविधा के तहत किया जाता है। हालांकि, जमीनी हकीकत इससे अलग दिखती है। कई जगहों पर पंचायत प्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों और स्थानीय नेताओं पर ‘कोटा’ पूरा करने का दबाव रहता है। गांव-गांव से लोगों को बसों में भरकर रैली स्थल तक ले जाया जाता है। इस प्रक्रिया में आम यात्रियों की जरूरतें पीछे छूट जाती हैं।

 

ड्राइवर और कंडक्टर भी परेशान ( सरकारी बस दुरुपयोग )

सिर्फ यात्री ही नहीं, रोडवेज के ड्राइवर और कंडक्टर भी इस व्यवस्था से खफा हैं। उन्हें अक्सर लंबी ड्यूटी, रात में वापसी और भोजन-विश्राम की अपर्याप्त व्यवस्था का सामना करना पड़ता है। कई कर्मचारियों का कहना है कि रैली ड्यूटी में सुरक्षा और सुविधाएं पर्याप्त नहीं होतीं, जबकि जिम्मेदारी ज्यादा होती है। इसके बावजूद उन्हें आदेश मानने पड़ते हैं।

राजनीतिक नैतिकता पर सवाल ( Roadways Bus Rally Duty )

लोकतंत्र में राजनीतिक गतिविधियां आवश्यक हैं, लेकिन क्या इसके लिए सार्वजनिक सेवाओं को बाधित करना उचित है? यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है। विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि सत्ता में बैठी सरकार अपने प्रचार-प्रसार के लिए सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग कर रही है। रोडवेज जैसी जनसेवा को राजनीतिक हितों के लिए मोड़ना न सिर्फ अनैतिक है, बल्कि नियमों की भावना के भी खिलाफ है।

 

छात्रों की पढ़ाई पर असर

परीक्षा और प्रवेश सत्र के दौरान रैलियों के कारण बसों की कमी छात्रों के लिए बड़ी समस्या बन जाती है। दूरदराज के कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र समय पर नहीं पहुंच पाते। कई बार परीक्षाएं छूटने तक की नौबत आ जाती है। अभिभावकों का कहना है कि राजनीतिक कार्यक्रमों की कीमत बच्चों के भविष्य से नहीं चुकाई जानी चाहिए।

ग्रामीण इलाकों की दुर्दशा

ग्रामीण क्षेत्रों में बसों की फ्रीक्वेंसी पहले ही सीमित होती है। ऐसे में जब दो-चार बसें भी रैली में चली जाती हैं, तो पूरा रूट प्रभावित हो जाता है। किसानों को मंडी जाने, महिलाओं को अस्पताल और बच्चों को स्कूल पहुंचाने में भारी दिक्कत होती है। कई गांवों में तो दिनभर कोई बस नहीं आती।

 

सरकार का पक्ष

सरकार की ओर से यह कहा जाता है कि रैलियां लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और उनमें जनता की भागीदारी जरूरी है। रोडवेज बसों का सीमित समय के लिए उपयोग किया जाता है और कोशिश रहती है कि यात्रियों को कम से कम असुविधा हो। हालांकि, जमीनी रिपोर्ट्स इस दावे की पुष्टि नहीं करतीं।

वैकल्पिक समाधान क्या हों?

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि रैलियों के लिए निजी बस ऑपरेटरों से अनुबंध किया जाए या अस्थायी शटल सेवाएं शुरू की जाएं। इसके अलावा, रैलियों का समय और दिन ऐसा चुना जाए जब नियमित यातायात पर कम असर पड़े। डिजिटल रजिस्ट्रेशन और स्वैच्छिक भागीदारी को बढ़ावा देकर जबरन भीड़ जुटाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सकती है।

 

जनता की आवाज

सोशल मीडिया और स्थानीय मंचों पर यात्रियों का गुस्सा साफ दिखाई देता है। लोग पूछ रहे हैं कि टैक्स के पैसे से चलने वाली रोडवेज क्या सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए है? आम आदमी की सुविधा कब प्राथमिकता बनेगी? कई नागरिकों ने इस मुद्दे पर जनहित याचिका की मांग भी उठाई है।

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