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राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में क्यों लेना पड़ रहा है बॉलीवुड का सहारा?

By हरियाणा न्यूज टूडे

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 Why do political parties have to take the help of Bollywood in elections?

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हरियाणा न्यूज टूडे। बात 1975 में आपातकाल के दौरान की है जब कांग्रेस सरकारी योजनाओं का प्रचार किशोर कुमार के गानों के जरिए करना चाहती थी मगर किशोर कुमार ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया था। नतीजन किशोर कुमार के गाने ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर बैन कर दिए। यह बैन 3 मई 1976 से लेकर आपातकाल खत्म होने तक जारी रहा था।

 इस दौर में सरकार ने फिल्म जगत से सख्ती से पेश आना शुरू कर दिया। जबरिया सेंसरशिप और सरकार के हुकम पर नाचने गाने के रवैये से खिन्न होकर फिल्म जगत ने सरकार को सबक सिखाने की ठान ली थी। आज हालात यह है कि राजनीतिक दलों का बॉलीवुड के बिना गुजारा ही नहीं है हर चुनाव में उन्हें कलाकारों का सहारा लेना ही पड़ता है।

कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए जनता पार्टी का दिया था साथ एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 1977 में

जब आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस से नाराज फिल्मी अदाकारों राम जेठमलानी के कहने पर जनता पार्टी का साथ देने का निर्णय लिया। इस चुनाव में कई फिल्मी हस्तियों ने जनता पार्टी के उमीदवारों का जमकर चुनाव प्रचार किया। जनता पार्टी की सरकार बनने पर फिल्म जगत को बहुत उम्मीद थी, लेकिन जनता सरकार जब पतन की ओर थी, तो राजनीतिक दल के गठन को लेकर फिल्म जगत में कवायद शुरू हो गई।

 नैशनल पार्टी का ऐसे हुआ गठन रिपोर्ट में कहा गया है कि 14 सितम्बर 1979 को मुंबई के ताज होटल में ‘नैशनल पार्टी’ के गठन की घोषणा की गई थी। देवानंद को इस पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था। पार्टी का घोषणापत्र भी जारी किया गया, जिसमें कहा गया था कि इंदिरा गांधी की तानाशाही से त्रस्त लोगों ने जनता पार्टी को चुना, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। अब देश को एक स्थायी सरकार दे सकने वाली पार्टी की जरूरत है। नैशनल पार्टी के गठन का मकसद देश के लोगों को थर्ड आल्टनेंटिव देने का है। निर्माता-निर्देशक वी. शांताराम, जी.पी. सिप्पी, राम बोहरा, आई.एस. जोहर, रामानंद सागर, आत्माराम और साथ में शत्रुघन सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमामालिनी व संजीव कुमार जैसे जानेमाने लोग पार्टी के साथ जुड़े थे।

चुनाव लड़े बिना ही ऐसे खत्म हुई पार्टी

कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जी.पी. सिप्पी और रामानंद सागर जैसे असरदार फिल्म वालों को नसीहत दी कि चुनाव के बाद होने वाली मुश्किल से फिल्म उद्योग को बचाना है तो पार्टी राजनीतिक गतिविधियां बंद कर दे। इसके बाद सक्रिय कलाकार नैशनल पार्टी से किनारा करने लगे और देवानंद अकेले ही रह गए। नैशनल पार्टी बिना चुनाव लड़े ही खत्म हो गई।

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